क्या क्या दूं आशीष?

तुम्हीं बताओ बेटी मेरी, दूं तुम्हें क्या आशीष ।

तुमसे है आल्हादिनी सेवित धारा की कशिश।।

कृतार्थ मन मेरा,नत्मस्तक चरणों में तेरे शीश।

रुकती नहीं धारा ,भाव बहते बन अश्रू रंजीत।।

प्रति-पल देती मुझेको छाया, बन वीरांगना नारी।

मेरे कष्टों की जैसे तुम्हे मिली,ईश्वर से जिम्मेदारी।।

कभी ना आस किया था, जायी बनेगी मेरी जननीं।

हुई अवतरित जीवन में मेरे, बनकर अम्रृत संचिनी।।

हर प्रश्न का उत्तर वह मेरे,अकेलेपन की वह संगिनी।

सूर्य की गर्म किरणों में, शीतलता की वह है टहनी।।

होता समय ना साथ मेरे,वह आती बन कर सहारा।

अपनी बातों से देती श्याम नभ को जगमगाता तारा।।

एक वही मेरी बेटी अकेली, ज़ख्म मेरे जो है सहलाती।

जब छोड़ते रिश्ते सारे, सदा साथ खड़ी वह मेरे रहती।।

उगते उजाले की चहकती चिरैया, सुबह का वह तारा।

अंधेरे में रौशनी वह मेरी, मिटता जिससे ग़म हमारा।।