गर्मी से राहत

मंच को नमन ।
महिला काव्य मंच पश्चिम रांची
शीर्षक-” गर्मी से राहत “
विधा -कहानी
तारीख- 28. 4. 2026 "गर्मी से राहत "

ईश्वरी एक संथाली युगती थी। देखने में वह बीस-बाईस साल के, लगभग की होगी। उमर को देखते ,वह ज्यादा गंभीर दीखती थी ।जब वह मेरे घर रेजा का काम ,करना शुरू की तो उसके तीनों बच्चे भी उसके साथ ही आने लगे। उन्हें वह अपना गमछा बिछाकर बैठा देतीऔर बीच में सबके खाने के लिए बरही(चावल का लावा)रख देती। बच्चे उन्हीं फरही के दानों में व्यस्त हो जाते। जैसे उसके शरीर का गठन था, ठीक वैसा ही बच्चों का भी था। वह ज्यादा लंबी ना थी। जब तीनों बच्चों के साथ वह खड़ी होती तो अपने बड़े पुत्र से वह ज्यादा ऊंची न दिखती।
तीनों बच्चे पांच बरस के अंदर के ही थे ,दो बेटा और एक बेटी ।बेटी सबसे छोटी किंतु बोली और बात में सबसे तेज ।जब भी मैं कुछ खाने को देती वह सबसे पहले दौड़ कर आती।तीनों बच्चों के बाल घुंघराले थे गहरे रंग के जिस्म पर ईश्वरी सदा उन्हें हल्के रंग के कपड़े पहनाती ।
सौतेली मां ने, ईश्वरी को आते के साथ ही उसके पिता से उसका विवाह कर देने की जिद ठान ली। और ईश्वर को प्रौढ़ता की उम्र से पहले ही सौतेली मां के शराबी भाई के साथ घर बसाना पड़ा। एक पर एक लगातार तीन बच्चे भी हो गए ।फिर वही कहानी दोहरा दी गई जिससे अनेक औरतों को अपनी चौखट से बाहर कदम रखने पर मजबूर किया है ।
ईश्वरी का पति ताड़ के पेड़ से ताड़ी उतारा करता था। व्यवसाय से उसने ताड़ी पीने की भी आदत पा ली थी। नहीं मिलने पर वह मारपीट करता और ईश्वरी के खेत में मेहनत से खट कर कमाए हुए पैसे भी वह छीन लिया करता था। अंततोगत्वा ,एक रात ईश्वरी दूधमुंही बच्ची को छाती पर बांध और बाकी दो बड़े बच्चों को हाथों से पकड़, अंधेरे का सहारा लेकर रांची आ गई।
नए-नए बनते घर के लिए रेजा(मजदूरिन )का काम करने लगी। मेरा भी घर बन रहा था और मैं भी उसी की देखरेख में वहीं रहने लगी थी। मेरा झुकाव देखकर वह मुझसे जुड़ सी गई ।

गर्मी का दिन और कड़ी धूप सबके लिए असह्य था वह मेरे बराम्दे की जमीन पर बच्चों को सुला देती। बच्चों को जब वह अपनी लाचारी ना समझ पाती तो खाने की छुट्टी होने पर तीनों को टिफिन से बासी रोटी निकाल कर खिलाती और उन्हें लिटा कर ,भीगे गमछे से हवा करती रहती ।हवा करते-करते वह स्वयं भी उंघने लगती।

मन तो मेरा दया से भर जाता था, पर पति के डर से, मैं ज्यादा आगे ना बढ़ती ।वे सदा एक ही बात कह कर मुझे सतर्क रहने को कहते,”जिससे परिचय ना हो उन्हें ज्यादा प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। तुम्हें मालूम है ना, पिछले साल होली पर कैसे वे दो रंग रोगन करने वाले लड़के प्रसाद जी का घर भी लूट ले गए और उनकी पत्नी की जान भी लेकर भाग गए। यह कहां से आई है, और क्या करके आई है, कौन जाने।” मैं उनकी हिदायत सुनकर आगे बढ़ने से हिचकती। अंततोगत्वा, ईश्वरी को मैंने बरामदे पर भी सोने को जब मना किया, तो वह अपने बच्चों को गेट के बाहर ऊंचे पेड़ के नीचे रखने लगी ।
उस दिन भी गर्मी से परेशान, उसके बच्चे हवा करने के लिए मचल रहे थे। वह काम के बीच ,हर एक घंटे पर जाकर बच्चों को गमछा गीला कर सारा बदन पोंछ देती तो बच्चे राहत पाकर खेलने लगते।
दिन में 1 से 2 के बीच ,जब उस दिन खाना खाने की छुट्टी हुई ,तो वह हाथ पांव धोकर अपने टिफिन को निकाल, सब बच्चों के साथ घर से लाई बासी रोटी खाकर ,सबके साथ वहीं घास पर लेट गई ।फिर बच्चों को खुश करने के लिए थोड़ी देर बाद वह अचानक उठी और नल पर जाकर अपने आंचल को गीला कर निचोड़ी। फिर साथ लाए गमछे को भी भींगा कर ले आई। लौटकर तीनों बच्चों को एक लाइन में उसने सुलाया और कुछ संथाली भाषा में हिदायत दी। सब के ऊपर वही गीला गमछा पसार दी।
बच्चे छोटे थे अतः गमछे ने उन्हें ढक लिया। फिर उन्हीं के बगल में अपने भीगे आंचल को लपेटकर वह भी लेट गई ।
मैं यह सब दूर से देख रही थी। ईश्वरी बच्चों के साथ गहरी नींद में बदहवास सोई पड़ी थी। शायद गर्मी ने उन्हें राहत दे दी थी।
————-

स्वरचित एवं मौलिक रचना।

शमा सिन्हा
रांची, झारखण्ड।