बड़ा अपनापन सा मुझे लगता है।
गुजरते हुए खामोश तेरी गलियों से।
ठिठके कदम अक्सर रुक जाते हैं।
तेरे घर से जब भी हम गुजरते हैं।
खिड़कि पर कभी जब तुम दिखती ।
एक मुस्कान मेरे होठों पर है छाती ।
लबों पर तुम्हारे भी माधुरी सी है आती।
तपिश की हवा भी ठंडक है देने लगती।
काश! एक झलक तुम्हारी फिर मिले।
आरजू है सामना होता तुमसे अकेले ।
पहर ऐसा ,जब कोई ना हमें देख सके।
वैसे सदा रहता है साया तुम्हारा साथ मेरे।
डरता हूं जमाने की बेमुरव्वत नजरों से ।
रुकावट ना बनायें,मेरे आने की खबर से।
जाने क्यों वह मुझे दुश्मन है समझते।
रोक ना दें मेरा गुजरना तेरी गलियों में।
स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची, झारखंड।