“मन को पत्र “

तुझको समझाऊ कैसे रे मन ,तू मेरा कैसा मीत,

परिंदों की उड़ान,श्रावण समीर या है गौरैया गीत ?

उड़ा कर साथ कभी ले चलते मुझको, इंद्रधनुष को छूने,

घर के छत से बहुत ऊपर खुलते झरोखे जिसके झीने।

बिना रोक टोक के चलतीं जहां, चारों दिशाओं से हवाएं,

चमकती है चांदनी जहां से, और टपकती ओस की बूंदें।

बिजली की धड़कन में छुपा स्वाति का घर है जहां पर।

भींच कर बाहों में, सीने से लगा,भर लेता,अंक  अपने समाकर!

लड़ियां जुगनू की लटकी है जहां बहार के मण्डप पर।

तू उमंगित करता मुझको आस-सुवासित जयमाल पहनाकर ।

मनमौजी तू,,चल देता है कभी अनजान जाल में उलझाकर ,

घबड़ा जाती हूं मैं पशोपेश के अंधेरे में तब दिल थाम कर।

चाह हमारी रह जाती है,बनाऊं साथ तुम्हारे महफिल ऐसी,

हम दोनों ही बस बातें करते, कुछ तुम और कुछ मैं कहती।

मेरे मन,कहने को बहुत है पर अब कुछ भी ना कहूंगी,

भूल कर जग सारा, तेरी  नांव की पतवार मैं  सहेजूंगी।

गीत मधुर गाकर कोई, मेरे भावों को तुम  सहला दो,

सुनकर जिसे भूल जाऊं हर ग़म, मुझे जो तुम अपना लो।

तुम्हे छोड़ कर ऐ मन! ख्वाहिश नहीं मुझे अब कुछ भी,

तुम हो सुकून नायाब, श्वासों की जश्ने- विरासत हो मेरी!

मेरे मन तूने,प्रति क्षण  साथ निभाया,एक काम और करना,

खिलते हैं  खुशबूदार फूल जिस गुलशन,वहां चले जाना।

आंचल अपने समेट उनको, चुपके से उमंगें- इत्र  भर देना।

रे मन,तू जगे या सोये, उनके बीच ही तू सदा बसे रहना!

शमा सिन्हा

२५-११-२४