मायके का संदेश

लघुकथा प्रतियोगिता
१५ मार्च २०२६
शीर्षक -“मायके का संदेश”

“मायेका का संदेश “

“आम ले लो! आम ले लो! आम ले लो! मीठे मीठे आम ले लो!” करती हुई वह बुढ़िया गली के एक छोर से दूसरे छोर पर जाती ।अक्सर उसका सारा फल कोई ना कोई ले लेता। ऐसे तो वह उम्र से बुजुर्ग थी और ज्यादा बोझ लेकर चल नहीं पाती थी फिर भी अपनी रोजी-रोटी कमाने को वह स्वाभिमानी औरत प्रतिदिन सुबह 11:00 से 3:00 के बीच में सुषमा के घर का चक्कर जरूर लगा लेती थी। उसके चबूतरे पर बैठकर उसके नैहर की बातें कर लेती थी। घर में सुषमा के सास -ससुर और पति थे। पिता थे नहीं ,भाइयों ने मिलकर बहुत मुश्किल से उसकी शादी एक ऑफिस में काम करते क्लर्क से कर दी थी। नाम उसका ऋषभ था। पांच बहनों के बीच वह अकेला भाई सब की मनोकामना पूर्ति का आधार था। वैसे तो वह बहुत ही सीधा था किंतु परिवार के बहकाने में आकर अक्सर वह सुषमा के नैहर से दहेज न मिलने का उलाहना दे दिया करता था ।उम्मीद की बाढ़ में ऋषभ के माता-पिता भी बिना सोचे समझे सुषमा की मां पर शब्दों का वार करते ।सुषमा की मां अपनी बेटी की खुशी के लिए किसी तरह से हर आने जाने वाले के साथ संदेश के रूप में एक- आध किलो मिठाई भेज दिया करती थी ।ज्यादा उसकी औकात ना थी। सुषमा के पिता के जाने के बाद वह खुद भी अपने इकलौते बेटे के साथ ही रहती थी ।
ऋषभ की नौकरी साधारण थी अत: उसे बहुत दहेज देने वाले परिवार से शादी का रिश्ता न आया ।इसी बीच सुषमा को, ऋषभ की मां ने देखा और उसके गुण और सौंदर्य पर वह रीझ गईं।इसी नशे में उन्होंने तिलक को ना तोला ।शादी हो गई और सुषमा घर की कामकाजी बहू बन गई ।वैसे उससे सभी बहुत खुश रहते लेकिन दहेज के लिए उनका मुंह कभी बंद ना होता ।उनकी ऊंची आवाज और कड़े शब्दों को सुनकर सुषमा आहत हो जाती ।वह पढ़ी-लिखी तो थी किंतु नौकरी करने की इजाजत उसे न थी।
गर्मी का दिन था और आम का मौसम था। ऋषभ की मां, अपने पड़ोसी, रामदेव बाबू के घर उनकी बहू के मायके से आए आम के टोकरी को देखकर लौटी तो सुषमा को सुनाएं बिना ना रह सकीं। “उनकी बहू को देखो कितनी सलोनी है। जाड़े में मिठाई की ढेर और गर्मी में आम!अभी-अभी उसके घर से दो टोकरी दशहरी आम के आए हैं ।सभी बच्चे आनंद मना रहे हैं रामबाबू की पत्नी टोकरी खोलकर बैठी हैं। मुझे भी उन्होंने पांच आम दिए ।यह देखो बहुत कितनी सुंदर सजीले और खूबसूरत आम है ! कहने को तुम अकेली बेटी ,लेकिन कभी नैहर से संदेश ना आया। अब तुम्हारी मां को कौन समझाए? समय-समय पर दामाद और ससुराल के लिए संदेशे भेजे जाते हैं, तब ना बेटी का सत्कार होता है।”
सुषमा सुनकर परेशान हो उठी ।वह करती भी तो क्या करती ।ना उसके हाथ में वह दम था कि वह अपनी मां को रुपए भेज कर ससुराल के लिए संदेश मांगती और ना पति पर इतना अधिकार ही । बाहर जाकर सुषमा अपने आंसुओं को पोछने लगी । तभी आम वाली बुढ़िया उसके दरवाजे से होकर गुजरी ।उसने पुकारा “अरे बिटिया ,बड़ा अच्छा आम लाई हूं ।तुम ना लगी क्या ?ज्यादा नहीं एक किलो ले लो।”
सुषमा ने सुना ,किंतु उसकी जमीन पर गड़ी आंखें उठी नहीं।उसे पता भी ना चला की कब फल-वाली आकर उसके समक्ष अपनी टोकरी रख कर बैठ गई ।
“अरे बेटी! ये आंसू क्यों टपका रही हो? इतनी उदास क्यों हो ? मुझसे कहो मैं भी तो तुम्हारी मां सी हूं।” इतना सुनना था की ,सुषमा उसके गले लग कर रो पड़ी ।
“क्या हुआ गुड़िया ?क्या सास ने कुछ कह दिया? चलो आज मैं ही तुम्हारी मां हूं ।यह लो,यह सारे आम आज अपनी सास को अपनी इस मां की ओर से देना और कहना कि यह तुम्हारी मायके से संदेशा आया है ।”
सुषमा सुनते के साथ उसके पैरों पर गिर पड़ी।” ऐसे नहीं करते बेटा ! हिम्मत रखो, ईश्वर तुम्हें बहुत देंगे।हमारा आशीर्वाद है कि इसी घर में तुम रानी बनकर रहोगी ।अब मैं चलती हूं बेटा। “
इतना सुनना था की सुषमा बोल पड़ी ,”अम्मा अगर मुझे बेटी मानती हो तो ,मेरे घर से यूं न जाओ ।यह संदेश मैं तभी लूंगी ,जब तुम मेरी बनाई रोटी खाकर जाओगी ।आज से तुम मेरी मां हो।मुझे यूं ना छोड़ना अम्मा !आती रहना।”
सुषमा बड़ी स्फूर्ति से अंदर गई और गुड़ के साथ रोटी और पानी लाकर फल वाली के हाथ में रख कर उसने उसके पैर छू लिए।

स्वरचित और मौलिक।

शमा सिन्हा
रांची,झारखंड।