मायके का संदेश

लघुकथा प्रतियोगिता
मार्च २०२६
शीर्षक -“मायके का संदेश”

“मायेका का संदेश “

“आम ले लो! आम ले लो! आम ले लो! मीठे मीठे आम ले लो!” करती हुई वह बुढ़िया गली के एक छोर से दूसरे छोर और दूसरे छोर से तीसरे छोर पर जाती अक्सर उसका सारा आम सारा फल कोई ना कोई ले लेता ऐसे तो वह उम्र से बुजुर्ग थी और ज्यादा बोझ लेकर चल नहीं पाती थी फिर भी अपनी रोजी-रोटी कमाने को वह स्वाभिमानी औरत प्रतिदिन सुबह 11:00 से 3:00 के बीच में सुषमा के घर का चक्कर जरूर लगा लेती थी। सुषमा भी उससे जुड़ गई थी वह बुद्धि उसका हाल-चाल पूछता और उसके चबूतरे पर बैठकर अक्सर आधा घंटा उसे उसकी मां का उसके नैहर का सारी जानकारी लेती थी। घर में सुषमा के सास ससुर पति थे अभी कोई बच्चा ना हुआ था शादी हुई उसको सिर्फ एक साल ही हुआ था पिता थे नहीं भाइयों ने मिलकर बहुत मुश्किल से उसकी शादी एक ऑफिस में काम करते क्लर्क से कर दी थी नाम उसका ऋषभ था। पांच बहनों के बीच वह अकेला भाई सब की मनोकामनाओं का से सोर्स बन गया था वैसे तो वह बहुत ही सरल और सीधा था किंतु परिवार के खाने में आकर अक्सर वह सुषमा को मैहर से दहेज न मिलने का बुलाना दे दिया करता था उम्मीद की बाढ़ में ऋषभ के माता-पिता भी बिना सोचे समझे सुषमा की मां पर रोज ला दिया करते थे सुषमा की मां अपनी बेटी की खुशी के लिए किसी तरह से हर आने जाने वाले के साथ मैहर से संदेश के रूप में आधा किलो एक किलो मिठाई लड्डू भेज दिया करती थी ज्यादा उसकी औकात में थी क्योंकि सुषमा के पिता के जाने के बाद वह खुद भी अपने इकलौते बेटे के साथ ही रहती थी ऋषभ की नौकरी साधारण थी आता है उसे बहुत दहेज देने वाले परिवार से कभी शादी के लिए अनुरोध न आया इसी बीच सुषमा को ऋषभ की मां ने देखा और उसके गुण और सौंदर्य पर वह रीच गई शायद इसी नशे में उन्होंने तिलक को ना ओला शादी हो गई और सुषमा घर की कामकाजी बहू बन गई पैसे स उससे बहुत खुश रहती है लेकिन दहेज के लिए उनका मुंह कभी बंद ना होता उनकी ऊंची आवाज और उधर सामान कड़े शब्दों को सुनकर सुषमा आहत हो जाती है वह पढ़ी-लिखी तो थी किंतु नौकरी करने की इजाजत उसे न थी शायद नौकरी करती तो वह सारी फरमाइशों को पूरा कर देती।
गर्मी का दिन था और आम का मौसम आ गया ऋषभ की मां लीला अपने पड़ोसी रामदेव बाबू के घर उनकी बहू के मायके से आए आम के टोकरी को देखकर लौटी तो सुषमा को बुलाना दिए बिना ना रहे उनकी बहू को देखो कितनी सलोनी है और उनके मायके वाले भी कितनी समझदार ज्यादा आता है तो मिठाइयों की ढेर और गर्मी आई है तो फलों की देर अभी-अभी उसके घर से दो टोकरी दशहरी आम के आए हैं सभी बच्चे आनंद मना रहे हैं रामबाबू की रामबाबू की पत्नी थी टोकरी खोलकर बैठी है मुझे भी उन्होंने पांच आम दिए यह देखो बहुत कितनी सुंदर सजीले और खूबसूरत आम है और एक तुम्हारी मां है खाने को तुम अकेली लड़की लेकिन कभी उन्होंने संदेश ना भेजो यह होती है बुद्धिमान लोगों की बातें अब तुम्हारी मां को कौन समझाए की लड़की का प्यार सिर्फ कर देने से नहीं उसको निभाना भी पड़ता है समय-समय पर दामाद और ससुराल के लिए संदेश भेजे जाते हैं तब ना बहू का सत्कार होता है ठीक है अपना अपना कर्म है शायद ऋषभ ने ऐसे कारण नहीं किया कि उसे संपन्न घरवाली मिलती संपन्न ससुर रहते तो आज उसके भी ससुराल से रामदेव बाबू के घर की तरह टोकरी में दशहरे आम आता।”सुषमा सुनकर परेशान हो उठी वह करती थी तो क्या करती ना उसके हाथ में वह दम था कि वह अपनी मां को रुपए भेज कर ससुराल के लिए संदेश मांगती और ना पति पर इतना अधिकार था कि वह उसे समझाएं ताकि ऋषभ अपनी मां को इस तरह से बोलने के लिए मना कर सके बाहर तो सारी पर बैठकर सुषमा अपने आंसुओं को पहुंचने में लगी थी तभी आम वाली गुड़िया उसके दरवाजे से होकर गुजरी उसने पुकारा अरे बिटिया बड़ा अच्छा ऑनलाइन हूं तुम ना लगी क्या ज्यादा नहीं 1 किलो ले लो ऐसे अब बचा भी काम है बहुत से बहुत 5 किलो होगा सुषमा सुन ली किंतु उसकी जमीन पर घड़ी आंखें उठी नहीं और उठाती भी कैसे उसके पास खाने को भी पैसे नहीं थे उसे पता भी ना चला की कब बुढ़िया जाकर उसके समक्ष अपनी टोकरी रख कर बैठे अरे बेटी यह आंसू क्यों टपक रही हो इतनी उदास क्यों हो उसने पूछा मुझसे कहो मैं भी तो तुम्हारी मां की मासी हूं इतना सुना था की सुषमा उसके गले लगा कर रोपदी क्या हुआ गुड़िया क्या सास ने कुछ कह दिया चलो आज मैं ही तुम्हारी मां बन जाती यह लोग यह सारे आम आज अपनी सास को अपनी इस मां की ओर से देना और कहना कि यह तुम्हारी मायके से संदेशा आया है सुषमा सुनते के साथ उसके पैरों पर गिर पड़ी ऐसे नहीं करते बेटा हलवाली ने फिर से समझाया हिम्मत रखो ईश्वर तुम्हें बहुत देंगे इतने धैर्य के साथ तुमने अपना जीवन बिताया है मैं तो तुम्हें देख रही हूं ना हमारा आशीर्वाद है कि इसी घर में तुम रानी बनकर रहोगी एक दिन अब मैं चलती हूं बेटा सुबह से कुछ खाया नहीं घर जाऊंगी तब रोटी बनाऊंगी और स्नान करके खाऊंगी।
इतना सुनना था की सुषमा बोल पड़ी ,”अम्मा अगर मुझे बेटी मानती हो तो ,मेरे घर से यूं न जाओ ।यह संदेश मैं तभी लूंगी जब तुम मेरी बनाई रोटी खाकर, और पानी पीकर जाओगी। आज से तुम मेरी मां हो।मुझे यूं ना छोड़ना अम्मा !आती रहना ।बड़ा सहारा होगा तुम्हारा। “
सुषमा बड़ी स्फूर्ति से अंदर गई और गुड़ के साथ रोटी और पानी लाकर फल वाली के हाथ में रख कर उसने उसके पैर छू लिए।
” अम्मा, मुझे अकेली ना छोड़ना ।यूं ही आती रहना ।तुम्हारे इस संदेश से मेरे जीवन में बहुत खुशी आ जाएगी।” कह कर सुषमा ने फलवाली के पैर छू लिए।

स्वरचित और मौलिक।

शमा सिन्हा
रांची,झारखंड।