मेरा घर

घर की चाहत ने मुझे बहुत है रिझाया ,

दौड़ी कई शहर पर ठौर ना एक पाया।

बुनती रही सपने दिन ऐसा तो आयेगा ,

अपनी भी छत पर, निरंतर सुकून बरसेगा।

समझ ना पाई मैं,कब कहां कर गई गलती,

कहूं कैसे दे गई दगा,मेरी ही ज़िन्दगी!

निभाती रही साथ जिसका,उड़ गया वह पंछी,

डूबा रहता मन मेरा, भाता नहीं अब कुछ भी।

छूट गया वो द्वार हमारा,सूना हो गया आंगन,

रिश्ते सारे छूट गये, भींगा रहता है अंतर्मन।

प्रभु तुम्हारी कृपा को सम्भाल नहीं मैं पाई,

दिखता चहुं ओर अंधेरा,और आगे है खाई।

अब आगे ना सम्भल पाऊंगी,देदो तुम सहारा,

देख रहा लुटता सब कुछ,करें क्या बेचारा!