मंच को नमन
महिला काव्य मंच पश्चिम रांची जिला इकाई
तारीख :4 5.2026
विषय- उम्मीद
शीर्षक: उम्मीद का अंत
विधा -लघु कथा "उम्मीद का अंत"
रुचिका को दो संताने थी ,बेटा राजेश और बेटी रुचिरा ।दोनों को उसने इंजीनियरिंग पढ़ाया किंतु दोनों संतानों में से एक थी उसके पास नहीं रहे। स्वाभाविक था दोनों ने अच्छी पढ़ाई की और अच्छी नौकरी पाकर दोनों ही बड़े शहर में काम करने लगे। उसने और उसके पति राकेश अपने बेटे राजेश की शादी बहुत जतन से खोज कर किया ।बेटा सीधा था अत: उन्होंने सोचा कि ससुराल वाले अगर मजबूत दिमाग के होंगे तो उनके परिवार और संपत्ति दोनों की, रक्षा होगी। भाग्य से, बहू भी देखने में सुंदर मिली तो रुचिका का कलेजा फूला ना समाया। इन सब बातों का ऐसा प्रभाव रुचिरा पर पड़ा की उसे लगने लगा कि परिवार वालों के लिए उसका वजूद अंधेरे में खो गया है।उसका मन भाई की शादी से जितना खुश नहीं हुआ, उससे कहीं ज्यादा वह अपमानित महसूस करने लगी। दिन-ब-दिन बढ़ते अवसाद ने उसे अपने ही माता-पिता से दूर कर दिया। इसी बीच उसका परिचय अशोक से हुआ दोनों इंजीनियरिंग कॉलेज में साथ-साथ पढ़ें थे और मेधावी छात्र होने की वजह से क्लास में ज्यादा चर्चित रहते थे ।घर के लोगों से दूरी ने रुचिरा और अशोक को और करीब ला दिया। दोनों ने शादी की इच्छा जाहिर की तो अशोक का परिवार तो राजी हो गया लेकिन रुचिरा के माता-पिता जातिवाद की आड़ लेकर शादी के लिए मना कर दिए। वे जमाने के बदलाव से अपरिचित थे। यह सोचकर निश्चिंत थे कि रुचिरा उनकी इच्छा के खिलाफ कुछ ना करेगी ।पर इस बात से अपरिचित थे कि पश्चिमी सभ्यता ने नवीन विचार के नाम पर बालिग बच्चों को स्वेच्छा का अधिकार बहुत पहले ही दे दिया है। जो होना था वही हुआ ।रुचिरा और अशोक कोर्ट मैरिज करके विदेश जा बसे। दोनों ही शिक्षित थे ।अच्छी नौकरी मिल गई । फिर उन्होंने पीछे मुड़कर ना देखा । रुचिका भी पुत्र और पुत्र वधू के मोह में मस्त हो गई ।उसके लिए उसकी पुत्रवधू और उसके मायके वाले जैसे देवी देवता हो गए। सारी सुरक्षा- सौहार्द- समृद्धि का आधार उसका समधीआना था कुछ साल तो बहू भी बहुत ही आज्ञाकारी बनी रही फिर धीरे-धीरे सजा हुआ रंग रोगन उतरने लगा ।रुचिका सदा एक ही बात कहती,” किसी ने नजर लगा दी है।”
रुचिका के पति राकेश ज्यादा बोलते ना थे ।अतः सब वही मानते जो रुचिका कहती।
अचानक ही बहू के शब्द भी कटुता उगलने लगे। पति-पत्नी में बिना बात के बहस होने लगी ।फिर दोनों के हाथ भी उठ गए। बात कोर्ट में पहुंची और एक दिन रुचिका की सारी उम्मीद पर “डाइवोर्स” का ठप्पा लग गया।
“निर्वाह निधि “,देने में राकेश और राजेश दोनों बाप -बेटेकी कमाई जाने लगी। तनाव के बढ़ते बोझ को राकेश सह ना सके और इस सदमे ने उनकी जिंदगी ले ली। रुचिका ने भी खाट पकड़ ली राजेश अकेला लड़ते-लड़ते अवसाद से गिर गया ।ऑफिस में आलोचना होने लगी ।निजि क्षेत्रीय नौकरी कितने दिन चलती? रुचिका की सारी उम्मीद पर पानी फिर गया। पलंग पर पड़ी पड़ी रुचिका गहरी सांस लेती और यही सोचती” काश मैंनेअपने परिवार को जोड़कर रखा होता तो आज मैं अकेली ना होती।”
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स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची, झारखण्ड।