मंच को नमन
मानसरोवर काव्य मंच
तारीख:15 जून 2026
शीर्षक: कहने को बस अपने हैं
विधा -कविता "कहने को बस अपनेहैं"
पल भर में बदल गए सारे के सारे रिश्ते।
सबसे ही मिले हों चुके थे अब कई मुद्दतें।
यह रिश्ते नहीं कहने को नाम से हैं अपने।
सभी बस व्यस्तता बता,आए चेहरा दिखाने।
मौके के लायक था पहनावा श्वेत उन सब का।
बनाकर अपने चेहरे खड़ा था सारा कुनबा।
बस इतना कह कर सारा परिवार चलता बना ।
“ऑफिस का है काम, जंजाल बहुत बड़ा।
“और रहती नहीं आजकल तबीयत ठीक हमारी।”
पलट कर पीठ, पल भर में सब गायब हुए बैरी।
शक था उन्हें कहीं मैं हिस्सा मांग ना बैठूं।
जायदाद की लूट में उनके,मैं गहरी ना पैठूं।
मैंने भी निश्चय था स्वालंबन का ठान लिया।
कहने को बस कुनबा अपना है,यह जान लिया।
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स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची झारखंड।
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