पारिवारिक एकता का पाठ

चल रहते हैं एक समय में अलग-अलग उम्र के प्राणी।

किंतु फर्क होता, बहुत बदल जाती है रहन-सहन वाणी

बड़े याद जब करते उनका बचपन ,भाती नहीं कहानी

मिटती नहीं पुरानी गांठे, गिनते  अपनी मान-हानी।

अक्सर जब वह जाते रूट और लंबी होती ताना तानी।

इस परेशानी से उबरने, बुजुर्ग रखते ताले में वाणी।

नई पीढ़ी के दोस्त बहुत नहीं है उनकी जवानी।

ढलती उम्र राहगीरों की होती सीमित  संचित कहानी!

गांठ बातों की घर में , चहुं ओर असहजता है पसारती। ।

भूलने में माहिर बुजुर्गों की पीढ़ी ,चादर तान है सोती।

छोटी बातों का बनता जब कभी ,जब बड़ा बतंगड़। 

ममता भरी पुरानी पीढ़ी मनाती उन्हें, आगे बढ़कर।

समय समक्ष लाता,उनके भी बच्चों की नई पीढ़ी ।

सिखाते वे वही पाठ पुराना, नौनीहाल चढ़ते सीढ़ी ।

बढ़ती उम्र की समझदारी, पहने रहें गहना खामोशी।

सबके लिए,पाठ एक ही, समय तोड़ता सबकी मदहोशी!

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स्वरचित और मौलिक रचना ।

शाम सिन्हा

रांची झारखंड।

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