मैंने बादलों को देखा।
सब छोटे-छोटे गुट बनाकर, अलग-अलग जाने कहां उड़ रहे थे।
  किसी की सोच नहीं मिल रही थी।
उन्हें पता ही नहीं था कहां जाना है। और कब बरसना है।
मैंने पूछा उनसे” क्या सोच रहे हो?
थोड़ा हमारी और भी तो देखो!
कितनी व्याकुलता है हमारी आंखों में !
देर ना करो,अब तो आ जाओ ।”
पर किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया।
सब अपनी मस्ती में, अपनी मनमर्जी से,
अलग-अलग रास्ता लेकरउड़ जा रहे थे।
पता नहीं कब वे हमारे आंगन को महकाने आएंगे,।
और देर तक हमारे तन मन पर सावन को बरसाएंगे।

स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
१८.६.२६

मैंने बादलों को देखा।
सब छोटे-छोटे गुट बनाकर, अलग-अलग जाने कहां उड़ रहे थे।
किसी की सोच नहीं मिल रही थी।
उन्हें पता ही नहीं था कहां जाना है। और कब बरसना है।
मैंने पूछा उनसे” क्या सोच रहे हो?
थोड़ा हमारी और भी तो देखो!
कितनी व्याकुलता है हमारी आंखों में !
देर ना करो,अब तो आ जाओ ।”
पर किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया।
सब अपनी मस्ती में, अपनी मनमर्जी से,
अलग-अलग रास्ता लेकरउड़ जा रहे थे।
पता नहीं कब वे हमारे आंगन को महकाने आएंगे,।
और देर तक हमारे तन मन पर सावन को बरसाएंगे।

बादल स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
१८.६.२६

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