समय चक्र

मंच को नमन।
महिला काव्य मंच पश्चिम रांची झारखंड
तारीख: 24. 6.26
शीर्षक समय चक्र
विधा-कविता "समय चक्र"

सपनों संग लिपटा हमको, नाश कर गई नादानी।

आवक बना समय -चक्र साथ ले गया जवानी।

अब हालत है ऐसी, सूरत नहीं जाती पहचानी।

समय- चक्र चर्चा बना रहा, सबकी ही परेशानी।

इन्ही सपनों में बीत गई सबकी अबूझ जिंदगानी ।

उच्च स्वर बोलता रहा त्रिकाल अपनी मूक वाणी।

“सबका ही साथ निभाऊंगा” इसने थी ठानी।

अपने जाल में खोया मनुष्य, समझा ना इसकी वाणी।

अंजान बना वह रहा तोलता, इसकी तीव्र रवानी।

महत्ता इसकी बहुत समझाती थी , दादी -नानी ।

अबूझ बन हम रहे देखते स्वप्न,भूल सारी चेतावनी।

ना समझ ने जब इसका महत्व समझा ,आ गई संध्या रानी।

और चला गया था दूर, नियति का बह गया था पानी ।

अल्हड़ बन हम रहे खेलते, कर ना पाए निगरानी।

बची रह गई बस खाली मुट्ठी, इसकी आखिरी निशानी।

चाहते तो वैसे सब थे बनाना, हैसियत अंबानी ।

मूढ़ मती बन, पीते रहे सब,
घाट-घाट का पानी ।

पर श्रमिक सा जीवन जीकर बहाया जिसने पानी ।

गिना नहीं इन्ही लोगों ने अपनी श्रम-हानी।

समय चक्र ने सजाई कीर्ति , ऐसी ही आत्मा की,पेशानी!

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स्वरचित और मौलिक रचना।

शमा सिन्हा।
रांची,झारखण्ड।

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