छप्पक छैया छप्पक छैया !
नहाने आई,सयानी गौरैया।
पंख पसार वह डुबकी लेती। सहेलियों को भी पास बुलाती।
चीं- चीं कर जाने क्या कहती।
पानी पीकर वह उड़ जाती
कहो सलोनी तुम क्या करती?
बदली जब बूंदे हैं बरसाती!
चिंता नहीं क्या तुमको घर की?
बनाया नहीं क्यों अपनी मढ़ई?
अनसुना कर, वह दाना चुगती।
पंख फड़फड़ा कर, उड़ जाती।
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स्वरचित और मौलिक रचना।
शमा सिन्हा
रांची,झारखण्ड।
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