• प्रभु, सुन लो बिनति!

    बना दिया है अपना अंश मुझे,दिया वह सब अभिलाषित गुण,फिर क्यों नहीं सम्भव वह सब,जो चाहता प्रति पल मन अब? सशक्त शरीर क्षीणकाय रहा बन,स्मृतिह्रास अब हो रहा क्षण क्षण,आस सुहास समेटती दुर्बलता कण,मूक दृष्टा बन, निहार रही मैं सब। रुदन से ही होता है यह कथा प्रारंभननवजीवन पर्व बनता, शिशु का मंगल क्रदंनहर्षित मात…

  • ऐसा क्यों होता है?

    क्यों कभी कभी दुआ भी गलत मांग लेतें हैं हम!खुद को ही बस, जीत का हुनरबाज मान लेते हैं हम!सामनेवाले को हराने में, खुद ही हार जाते हैं हम,और गम को छुपाने में, सबकुछ बता जाते हैं हम! वो क्या कहेंगें, हम पर हसेंगें, यही विचारते रह जाते हैं हम!वो भी सोच सकते हैं, यह…