• दिन महीने साल

    बीतते जाते हैं दिन महीने साल हंस कर देख सूरज से पूछा हाल बदल गए जीव संसार के सभी पर तनिक ना बदला तेरा हाल! ज्यों का त्यों तू दौड़ रहा पथ पर प्रेरित हो,तुझको देख रहा है नर यही बना है सहसा उसका काल स्वामित्व क्षितिज आकाश लेकर! फ़ुरसत नहीं चैन के पल दो…

  • दिनकर भैया!

    क्या कहकर मैं खुद को समझाऊं उन वादों को आज कैसे मैं  दोहराऊं। त्योहार पर जब हम सब  मिलते थे अश्रुजल से विदा आप हमें करते थे। अब कहो कौन वैसे हमें लौटायेगा? हम सबकी हौसला अफजाई करेगा? परिवार के दिनकर,भैया आप ही थे ! आपकी छाया हम भाई-बहन जीते थे! दे ना सकते हम…

  • मंच को नमन।

    महिला काव्य मंच रांचीतारीख -२०-१२-२४विषय -मां/ममताशीर्षक- मां तुम्हीं कहो,दूं क्या मैं तुम्हारा परिचय हमारी ज़िन्दगी ने लिखा तेरे नाम  हर विजय । रहता सजा हाथों में जिसके हैं अभयदान सदा,देख  मुझको चिर उद्गमित होती  उसकी ममता! जानती नहीं तू रात और दिन कभी में कोई फर्क ,छुपा है तुम्हारे आदान-प्रदान में निश्छल प्रेम अर्क! आकांक्षाओं…

  • जन्मदिन

    जीवन में जन्मदिन का वजूद विशाल होता हैएक दिन ही सही, सागर -सौभाग्य बरसाता है। ज़रूरी नही ,मजलिस लगे,दावतों का हो सिलसिला!पता नही फिर भी क्यों इस दिन बढ़ जाती हैउमंगे-हौसला? यह कोई नई बात नही, बचपन से रहा इसका दबदबा !सभी अग्रज के आशीष का सच्चा साकार है फलसफा ! सूर्योदय से ही जन्नती…

  • ; ” THE UNSURMOUNTABLE”

    Many a time, I wonder, watching the fleeting Clouds! They come and go without looking into any other direction, as if they were blinded from all sides alike a carriage horse, that cannot see anything, except its predestined path of journey! I wish I could send words of friendship and compassion request to these monsoon…

  • “जरा बचके!”

    हो रहा समय, मिलन सूर्य -संध्या का,तारों को बांंहों में समेट,छा रहा अंधेरा।“जरा बचके रखना कदम ओ मेरे सजना!”दे रहा आवाज, क्षितिज से मल्लाह नांव का। पता नही है दूर कितना अपना वह किनारा,भला यही,मध्यम धारा के संग बहते रहना!“जरा बचके दूर,नदी के भंवर से रहना!पतवार पकड़,दिवास्वप्न में तुम ना खोजाना!” यह सफर है,बस हिसाब…